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“गोलू कब तक खेलोगे? चलो, अंदर घर में।”  “बस मम्मी, थोड़ी देर और।” कहते हुए गोलू अपनी धुन में रम गया। घर के पिछले हिस्से में थोड़ी सी जमीन है। गोलू की मम्मी को बागवानी का शौक है। उस जमीन में उन्होंने मिर्च, धनिया, टमाटर, भिंडी, पपीता आदि के छोटे-छोटे पौधे लगा रखे हैं। इन पौधों के साथ-साथ उन्होंने रंग-बिरंगे फूलों को भी एक किनारे लगा रखा है। गंेदा और गुलाब तो खूब खिले हैं। गुलाबी, लाल, पीले और सफेद रंग के गुलाब गोलू को बरबस ही अपनी ओर खींच लेते हैं।  इन रंग-बिरंगे फूलों पर तितलियां भी खूब मंडराती हैं। सुंदर फूलों पर खूबसूरत तितलियों को देखकर गोलू चहक उठता। उसका मन होता उन तितलियों को पकड़ने का। कई दिनों से वह तितलियों को पकड़ना चाह रहा था, पर जैसे ही वह तितलियों के पास जाता, वे फुर्र से उड़ जातीं।  गोलू फिर से तितली की तरफ चुपचाप धीरे-धीरे आगे बढ़ता। वह फिर असफल होता, पर निराश नहीं होता। गोलू ने अपनी कोशिश जारी रखी।   गोलू की मम्मी कुछ देर बाद छत पर कपड़े सुखाने गईं, तो देखा कि गोलू अभी भी बगीचे में ही है। वह गुस्सा हुईं, “अभी तक तुम खेल ही रहे हो। चलो, अंदर आओ।”  “बस आ रहा हूं मम्मी।” कहते हुए गोलू अंदर जाने ही वाला था कि लाल वाले गुलाब के फूल पर पीले रंग की तितली उसे दिखाई दी। वह अपने नन्हे कदमों से चुपके-चुपके उसकी ओर बढ़ने लगा।  मम्मी छत से नीचे आईं, तो देखा कि गोलू अभी भी वापस नहीं आया है। वह बगिया की ओर बढ़ीं। गोलू को धीरे-धीरे चलता हुआ देखकर मम्मी दरवाजे के पास ही रुक गईं।  गोलू ने फूल के पास पहंुचकर तितली को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, पर इस बार भी तितली पकड़ में नहीं आई। मम्मी अपने बेटे की चंचलता देखकर मुसकरा उठीं। वह दरवाजे पर खड़े होकर गोलू को तितली पकड़ते हुए चुपके-चुपके देखने लगीं।  जिस तितली को गोलू पकड़ नहीं पाया था, वह  तितली दूसरे फूल पर जाकर बैठ गई। गोलू चुपके-चुपके उसके पीछे गया और बहुत आहिस्ता से अपना हाथ तितली की ओर बढ़ाया।  इस बार गोलू को तितली पकड़ने में सफलता मिल ही गई।।  गोलू खुशी से चहक उठा। पकड़ी हुई तितली वह मम्मी को दिखाने के लिए घर में जाने के लिए मुड़ा, तो देखा, मम्मी उसे ही देख रही थीं। वह मम्मी की तरफ बढ़ा और चहककर बोला, “मम्मी देखो, मैंने कितनी प्यारी तितली पकड़ी है।”  “हां बेटा, तितली तो बहुत प्यारी है लेकिन।” कहते-कहते मम्मी रुक गईं। “लेकिन क्या मम्मी?” “बेटा, इस प्यारी तितली को यदि तुम कुछ देर और पकड़े रहे, तो यह प्यारी तितली प्यारी नहीं रह जाएगी।” मम्मी ने समझाने का प्रयास किया। “वह कैसे मम्मी?” “तितली के पंख बहुत नाजुक होते हैं। तुम्हारी उंगलियों की पकड़ यह ज्यादा देर तक सह नहीं पाएगी और इसके पंख टूट जाएंगे। फिर भला यह टूटे पंखों के साथ प्यारी कैसे दिखेगी?” “ओह, मेरे पकड़ने से तितली के पंख टूट जाएंगे?” गोलू की आंखें अचरच से बड़ी हो गईं। “हां बेटा, तितली को पकड़ने से उसके पंख टूट जाते हैं।” मम्मी ने समझाया। “फिर मुझे क्या करना चाहिए?” गोलू ने भोलेपन से पूछा। “तुम्हें चाहिए कि तितली को उड़ने दो। उसे पकड़ो मत।” “हां मम्मी, तितली को उड़ने दो।” कहते ही गोलू ने तितली के पंखों से अपनी उंगलियों की पकड़ ढीली की और तितली को छोड़ दिया उड़ने के लिए। तितली उड़ी और घर की बगिया के एक फूल पर जाकर बैठ गई। कुछ देर बाद तितली उस फूल से उड़ी और दूसरे फूल पर जा बैठी।  गोलू और मम्मी खुशी-खुशी तितली को उड़ते देख रहे थे।   एक फूल से उड़कर दूसरे फूल पर जब तितली बैठी, तो गोलू को ऐसा लगा, जैसे तितली भी मम्मी की तरह उससे कह रही है, “तितलियों को उड़ने दो।”

 
 
 

चंद्रनगर के विक्रमसिंह पराक्रमी एवं उदार दिल वाले राजा थे। उनका राज्य चंद्रनगर धरती पर स्वर्ग जैसा था। प्रजा बहुत सुखी थी। किसी को कोई भी अभाव न था।  चंद्रनगर की प्रसिद्धि का एक और कारण था। वह था वहां का वसंत उत्सव। राजा विक्रमसिंह को तो फूलों से बेहद प्यार था ही, उनकी प्रजा भी इस उत्सव को पूरे मन से मनाती थी। तीन दिन तक चलने वाला यह उत्सव हर साल मनाया जाता था। वसंत आगमन से कुछ समय पूर्व प्रजा स्वयं अपने हाथों से क्यारियां बनाती, पौधे लगाती। हर रोज पूजा-अर्चना के साथ उन्हें जल से सींचती। प्रत्येक नगरवासी का अपने घर-आंगन एवं निकट के उद्यान से बहुत लगाव हो जाता था। इन तीन दिनों में राज्य के हर उद्यान में रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे। इस तरह के असंख्य पौधों को साथ-साथ देखकर लगता था, मानो प्रकृति ने धरती पर सतरंगी चादर बिछा दी हो। राजा विक्रमसिंह अपने दरबारियों के साथ तीनों दिन प्रजा के बीच रहते। प्रजा द्वारा उगाए फूलों की साज-सज्जा के अनुसार पुरस्कार देते और सराहना करते थे। इस बार के उत्सव का आज आखिरी दिन था। सारे नगरवासी खुशी में झूम रहे थे। उत्सव समाप्त हुआ, तो राजा ने अचानक घोषणा कर दी, “अगले साल यह उत्सव नगर में नहीं, राजमहल में मनाया जाएगाा और प्रजा भी उसमें भाग लेगी।” प्रजा ने प्रसन्नता प्रकट की। सबको लगा कि जब यह उत्सव राजकीय स्तर पर मनाया जाएगा, तो और भी अच्छा होगा। समय बीतते देर नहीं लगी। वसंत उत्सव का दिन भी निकट आने लगा और प्रजा बेसब्री से आयोजन का इंतजार करने लगी। लेकिन इस बार भी प्रजा ने अपने स्वभाववश, अपने-अपने आंगन में और निकट के बगीचों में फूलों को उगाया था। उधर राजमहल में उत्सव की तैयारियां जोर-शोर से चल रही थीं। उत्सव का आयोजन मंत्री के कंधों पर था। उसकी इच्छा थी कि आयोजन ऐसा हो कि लोग देखते रह जाएं। राजा चाहते थे कि उत्सव के दिन समूचा राजमहल फूलों से ढक दिया जाए। किंतु इतने फूल कहां से आएंगे? वसंत का आगमन हुआ। नगर में चारों ओर फूल ही फूल खिले थे। क्या घर, क्या उद्यान, क्या आंगन, सब तरफ सतरंगे फूल दिखाई दे रहे थे।। अचानक राजा ने आज्ञा दी, “राज्य में जहां कहीं भी फूल खिले हों, उन्हें तोड़ लिया जाए। उन फूलों से राजमहल को इतना सजाया जाए कि लोग वर्षों तक याद रखें।” मंत्री ने कहा, “महाराज! इसका शुभारंभ इस बार आपके द्वारा नगर के किसी उद्यान में से एक फूल तोड़कर, उसे महल में सुसज्जित कर देने से किया जाए, तो अच्छा रहेगा।” राजा को यह बात पसंद आ गई। वह रथ पर सवार होकर नगर के प्रमुख उद्यान में गए। एक सुंदर सा फूल उन्होंने स्वयं अपने हाथ से तोड़ा और उसे लेकर राजमहल में आ गए। राज्य के मुख्य द्वार पर उसे सजा दिया। सभी राजकर्मचारियों ने और नगरवासियों ने हर्ष-ध्वनि की। राजा की जय के नारे लगाए। राजा ने फूल अपने महल में सजाकर, वसंत उत्सव का शुभारंभ कर दिया था। अब देखते ही देखते राजकर्मचारी नगर में जहां कहीं भी फूल देखते, उन्हें तोड़कर और टोकरियों में भर-भरकर लाने लगे और राजमहल को सजाने लगे। कहीं कोई फूल नहीं बचा। लेकिन राजमहल फूलों की सुगंध से भर उठा। ऐसा लगा जैसे यहां वसंत देवता का वास हो गया हो। सारा नगर राजमहल में उमड़ पड़ा। राजमहल की फूलों से सजावट देखकर, लोग दांतों तले उंगलियां दबाने लगे। उत्सव का दूसरा दिन भी हंसी-खुशी से बीत गया। तीसरा दिन आया, तो राजमहल में सजे फूलों में उतनी सुगंध नहीं रह गई थी। तीन दिन में ही वे सब मुरझा गए थे। राजमहल पर टंगे, उन मुरझाए फूलों से महल भी बदरंग दिखाई देने लगा। राजा के साथ-साथ लोगों के मुख भी मुरझा गए। उन्होंने बहुत भारी मन से तीसरे दिन के उत्सव में भाग लिया। अब हर साल वसंत उत्सव इसी तरह राजमहल में ही मनाया जाने लगा। मगर अब वह तीन दिन के स्थान पर दो दिन का रह गया था। तीसरे दिन, मुरझाने से पूर्व फूल उतारकर फेंक दिए जाते और उत्सव समाप्त हो जाता था। धीरे-धीरे लोगों के मन में इस उत्सव के प्रति उत्साह कम होने लगा। अब वे अपने आसपास फूल उगाने में कोताही बरतने लगे। पहले फूल कई-कई दिन तक डालों पर मुसकाते रहते थे, किंतु अब उत्सव के दिन से ही कहीं कोई फूल दिखाई ही न देता था। प्रजा का उत्साह ऐसा कम हुआ कि एक बार वसंत के अवसर पर, राज्य में कहीं कोई सतरंगी फूल नहीं खिला। राजा को चिंता हुई। यदि फूल नहीं उगेंगे, तो यह उत्सव कैसे मनाया जाएगा! लोगों ने भी बड़ी कोशिश की लेकिन फूल उगाने के लिए उनमें उत्साह समाप्त हो चुका था। राजा की चिंता दिनोदिन बढ़ती गई। राजा ने कई मालियों को बुलाया। दूसरे राज्यों से भी इनाम के लालच में लोगों को बुलवाया गया, लेकिन कोई भी सतरंगे फूलों को उगाने में सफल न हो सका। राजा ने अनेक पूजा अनुष्ठान भी किए, किंतु उद्यान तो अपनी सुंदरता खो चुके थे। अब वसंत आने पर भी कोई फूल नहीं मिलेगा, ऐसा राजा को महसूस हुआ, तो वह कांप उठे। एक दिन राजा अपने सिंहासन पर उदास मन से बैठे सोच रहे थे कि मंत्री ने कहा, “महाराज, एक साधु आए हैं। वह आपसे मिलना चाहते हैं।” राजा ने साधु को बुलवाया। साधु को राजा का चिंतामग्न रहना अच्छा नहीं लगा। उन्होंने पूरी बात जानकर राजा से कहा, “ मैं आपके चंद्रनगर को फिर से फूलों भरा बना सकता हूं।” राजा के शरीर में जैसे जान आ गई। वह सिंहासन से तत्काल उतरकर साधु के पास आए और बेसब्री से पूछा, “कैसे?” “मेरे पास उपाय है।” “कैसा उपाय? आप जल्दी उपाय बताइए। जल्दी ही मेरी नगरी को फूलों से भर दीजिए।” “लेकिन राजन, आपको मेरा साथ देना होगा।” “मुझे मंजूर है। आप जो कहेंगे, वही मैं करूंगा।” साधु ने हवन सामग्री मंगवाई और यज्ञ प्रारंभ किया। यज्ञ एक महीने तक चलना था। रोज राजा को यज्ञ में आहुति देनी थी। राजा साधु के आदेशानुसार यज्ञ में आहुति देते। राजमहल के उद्यान के एक कोने में क्यारी सी बनाकर गुलाब के पौधे को सींचते भी थे। उधर यज्ञ अपनी चरम अवस्था में था और आश्चर्य! उद्यान में उस कलम में से पत्ते निकलने लगे थे। देखते ही देखते कुछ ही दिनों में उसमें गुलाब के फूल खिलने लगे। आज यज्ञ की समाप्ति का दिन था। साधु महाराज ने कहा, “राजन! अब अंतिम आहुति है। उठिए। जाकर वे फूल तोड़कर ले आइए, जो आपने अपनी मेहनत से सींचकर इतने बड़े किए हैं।” राजा उठे। फूलों के पास पहुंचे। उन्हें तोड़ने के लिए हाथ आगे बढ़ाना चाहा, किंतु उनका हाथ उठ ही नहीं रहा था। उन्होंने दोबारा कोशिश की, लेकिन इस बार भी सफल नहीं हुए। उन्हें लगा, इतने दिनों तक अपने हाथों से सींचकर जिन फूलों को इतना बड़ा किया है, उन्हें तोड़ना ठीक नहीं है। राजा को सोच में डूबा देखकर, साधु बोले, “महाराज! जिन फूलों को इतने दिनों तक आपने अपने हाथों सींचा है, उन्हें तोड़कर इस यज्ञ में डाल देने से कष्ट हो रहा है? लेकिन दूसरों के उद्यानों में अन्य लोगों की मेहनत से लगे फूलों को तोड़ने में तो आपको कभी कोई कष्ट न हुआ।” राजा की आंखें खुल गईं। अब सारी बात उनकी समझ में आ गई। वह साधु के पैरों पर गिर पड़े। क्षमा मांगने लगे। राजा ने घोषणा की कि अब से नगरवासी स्वयं वसंत उत्सव मनाएंगे। कोई भी राजकर्मचारी फूलों को नहीं तोड़ेगा। ऐसा करने वाले को सजा दी जाएगी।

 
 
 

गुनगुन शाम को पार्क में अपने हमउम्र दोस्तों के साथ खेलकर लौटी। उसे जोरों की भूख लगी थी। मम्मी खाना तैयार कर रही थीं। चाचाजी बाजार से रसगुल्ले लेकर आए थे। मम्मी ने उसे प्लेट में  रसगुल्ले दिए। रसगुल्ले लेकर गुनगुन पीछे खुले आंगन में चली आई। खाते-खाते रसगुल्ले के रस की कुछ बूंदें नीचे गिर गई थीं। थोड़ी देर में ही वहां नन्ही चींटियों की फौज आ गई। गुनगुन उत्सुकता से उन्हें देखने लगी।  तभी पीछे-पीछे उसके चाचाजी वहां आ गए। चाचाजी को देखकर गुनगुन ने पूछा, “चाचाजी, इन्हें कैसे पता चला कि यहां रसगुल्ले का रस गिरा हुआ है? ये तो कहीं भी नहीं थीं।” “वैसे ही जैसे तुम घर में रखी मिठाई तक पहुंच जाती हो गुनगुन।” चाचाजी ने हंसकर चिढ़ाते हुए कहा। गुनगुन ने नाराज होने का बहाना किया, तो उन्होंने कहा, “प्रकृति ने इन्हें बहुत अच्छी सूंघने की शक्ति दी है। इससे ये बहुत दूर से ही पता लगा लेती हैं कि इनका खाना कहां है और फिर अपने समूह के साथ पहुंच जाती हैं।” “पर इन्हें अपने घर का इतना लंबा रास्ता कैसे याद रहता है? ये तो कितनी छोटी सी हैं।” गुनगुन ने आश्चर्य से पूछा। “इनका छोटा सा दिमाग बहुत तेज होता है। रोशनी, याददाश्त और गंध की मदद से ये अपना रास्ता खोज लेती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियां चलते समय एक विशेष रासायनिक पदार्थ छोड़ती चलती हैं, जिसकी गंध से इन्हें आसानी से रास्ता पता चल जाता है। लेकिन जो चींटियां रेगिस्तान में रहती हैं, वे ऐसा नहीं करतीं। वे रास्तों की तसवीरें याद करती हुई चलती हैं।” चाचा ने कहा। “अरे वाह! मैंने मिट्टी में इनका घर देखा भी है। उसमें कौन-कौन रहते हैं और सब क्या-क्या करते हैं?” गुनगुन ने पूछा। “चींटिया भी हमारी ही तरह सामाजिक प्राणी हैं। इनका समाज भी नियमों पर चलता है। ये जमीन में सुरंग की तरह खोदकर घर बनाती हैं। कभी चट्टानों में, पेड़ों की छाल में, दीवारों में और कुछ अलग प्रजाति की चींटियां पेड़ों के पत्तों को सिलकर भी रहती हैं। इनके घर में सबसे बड़ी रानी चींटी होती हैं, जिनके शुरुआत में पंख होते हैं। यह ढेर सारे अंडे देती हैं। रानी चींटी के अलावा नर चींटियां और श्रमिक चींटियां भी होती हैं। नर चींटियां और रानी चींटी सामान्यत: बाहर नजर नहीं आतीं। नर चींटियों का जीवन छोटा होता है। जिन्हें हम देख रहे हैं, ये श्रमिक चींटियां हैं। इनका काम खाना लाना, बच्चों की देखभाल करना, कॉलोनीनुमा घर बनाना और साफ-सफाई रखना होता है। इनमें से कुछ रक्षक चींटियां भी होती हैं, जो घर की देखभाल करती हैं।” चाचाजी ने बताया। “अरे वाह! इतनी छोटी सी, पर सब कुछ इतना व्यवस्थित! चाचा, जैसे हम मनुष्य लड़ते हैं, क्या वैसे इनमें भी झगड़ा होता है?” गुनगुन ने कुतूहल से भरकर पूछा। “हां, कभी-कभी दूसरी कॉलोनी की चींटियों से झगड़ा होता है। इन सबकी तय सीमा होती है। लेकिन बढ़ते परिवार के साथ इन्हें अपनी सीमा भी बढ़ानी होती है। इसी बात पर इनका कभी-कभी झगड़ा हो जाता है और फिर वह कई घंटों और कभी-कभी हफ्ते भर तक भी चलता है। इनकी लड़ाई बहुत खतरनाक होती हैं, जिसमें ये मर भी जाती हैं।” चाचा ने गंभीरता से जवाब दिया। “ओह , यह तो बुरी बात है।” गुनगुन थोड़ा उदास होकर बोली। “हां, है तो। हर प्राणी में कुछ अच्छाइयां और बुराइयां होती हैं। चींटियों में भी ऐसा ही है। जैसे कुछ प्रजातियां किसी और कॉलोनी से झगड़ा होने पर और जीत जाने पर, उनके लार्वा (बच्चों) को ले आती हैं और उन्हें गुलाम बना लेती हैं।” चाचा ने कहा। “ओह! पर ये अपनी साथी चींटियों को पहचानती कैसे हैं चाचाजी? देखने में ये सब तो एक सी होती हैं।” गुनगुन ने पूछा।  “दो तरह से ये एक -दूसरे को पहचानती हैं। जैसा कि मैंने पहले बताया कि इनके शरीर से एक हारमोन निकलता है, जिसे फेरोमोन कहते हैं। एक-दूसरे के फेरोमोन को सूंघकर ये संपर्क बनाए रखती हैं। तुम्हें पता है, अगर हम इनकी कतार के रास्ते को पानी से पोंछ दें तो पीछे आने वाली चींटियां भ्रमित हो जाती हैं, क्योंकि आगे वाली चींटियों की गंध ही समाप्त हो जाती है। इनके संपर्क का दूसरा तरीका होता है, एक-दूसरे के एंटीना को छूना। जो तुमने कभी देखा भी होगा।” चाचा ने उत्तर दिया।  “हां चाचाजी, मैं हमेशा सोचती थी कि ये एंटीना को छूकर करती क्या हैं? ये पास-पास आकर आपस में बातें करने लगती थीं।” गुनगुन ने हंसते हुए कहा और फिर पूछा, “अच्छा चाचाजी, ये क्या हमारी आवाज सुन सकती हैं?” “इनके कान नहीं होते गुनगुन। पर ये ध्वनि के कंपन को महसूस करती हैं। आसपास की आवाजें महसूस करने के लिए इनके घुटने और पांव में सेंसर लगे होते हैं।” चाचा ने जवाब दिया।  “और भी कुछ बताइए न चाचाजी इनके बारे में।” गुनगुन ने उत्सुकता से पूछा।  चाचाजी ने सोचते हुए कहा, “अच्छा, तुम्हें पता है इनके पेट के दो हिस्से होते हैं। एक में ये खुद का खाना खाती हैं और दूसरे में रानी चींटी, बच्चों और अन्य सदस्यों के लिए खाना रखकर ले जाती हैं। तुमने यह भी देखा होगा कि खाने को पकड़े-पकड़े कभी-कभी ये उलटा भी चलती हैं। अपने भार से कई गुना ज्यादा भार ये उठा लेती हैं। ये उलटे कदम चलकर भी घर पहुंच सकती हैं। चींटियों की बहुत सारी प्रजातियां होती हैं। सभी के गुणों और व्यवहार में थोड़ा-बहुत अंतर होता है। अभी और कई बातें वैज्ञानिक जानने में जुटे हैं। हो सकता है कि आगे कुछ नई जानकारियां मिलें और कुछ पुरानी बदलें भी।” चाचाजी ने विस्तार से बताया।  गुनगुन कुछ सोचते हुए बोली, “चाचाजी, चींटियां कितनी समझदार होती हैं। काश! हम इनसे कुछ सीखते और फिर किसी भी मनुष्य को भूखा नहीं रहना पड़ता। मैंने यह भी देखा है कि ये कभी भी हार नहीं मानतीं। हमारी क्लास का एक लड़का गर्वित चींटियों को बहुत परेशान करता है। वह बार-बार चींटी का रास्ता रोकता है। लेकिन ये कभी भी प्रयास नहीं छोड़तीं और घूम-फिरकर अपना रास्ता पकड़ ही लेती हैं। बस ये काट भी लेती हैं कभी-कभी, पर वह तो ये अपनी रक्षा के लिए करती हंै न!” गुनगुन ने मासूमियत से कहा।  “हमें यही तो करना होता है गुनगुन, सभी की अच्छाइयों से कुछ सीखना। और हमारी गुनगुन तो और भी समझदार है, तभी तो इतनी प्यारी बातें करती है।” चाचा ने प्यार से कहा। मां ने गुनगुन को खाने के लिए आवाज दी, तो गुनगुन मन ही मन अपनी दोस्त चींटियों से कभी-कभी मिलने और खाना लाने का वादा कर, चाचाजी के साथ रसोई में चली आई। 

 
 
 
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