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मोती एक शिकारी कुत्ता था। पतला-दुबला, लंबा, देखने में जरा भी खूबसूरत नहीं लगता था। पर उसकी आंखें बड़़ी थीं। हमेशा प्यार से चमकती रहती थीं। दादी को वह बहुत प्यार करता था। दादी भी उसे बहुत चाहती थीं। दादी गांव में रहती थीं। परिवार बड़ा था। मकान भी बहुत बड़ा था और गांव में उन दिनों डाकू भी खूब आते थे। रात को अकसर कहीं न कहीं डाका पड़ ही जाता था। इसीलिए लोग कुत्ते पालते थे। शिकारी कुत्ता डाकुओं को देखते ही पहचान लेता था। फिर तो वह खतरनाक हो उठता था। उसके हमले से बचना कोई मामूली बात नहीं थी। इसीलिए मोती की बहुत पूछ होती थी। वह सबका प्यारा था। वह घर के किसी आदमी पर कभी हमला नहीं करता था। प्यार इतना करता कि लोग परेशान हो जाते। वह गांव, गंगा नदी से कुछ ही दूर था। कार्तिक के महीने में वहां बड़ा मेला लगता था। दादी हर साल उस मेले में हम सब बच्चों को भी लेकर जाती थीं। उनकी रखवाली के लिए मोती भी जाता था। बच्चों को वह खूब पहचानता था। उनका दोस्त जो बन गया था। एक बार ऐसा हुआ कि मोती उस मेले में गायब हो गया। बहुत ढूंढ़ा, लेकिन कहीं पता नहीं लगा। किसी ने कहा कि उस पार चला गया है, उसने उसे नदी में घुसते देखा था। मेला खत्म हो गया, लेकिन मोती नहीं आया। हमने समझ लिया कि कोई उसे पकड़कर ले गया है या वह नदी में डूब गया है। सभी बहुत दुखी थे, लेकिन दादी के दुख की मत पूछो। रोत-रोते उनकी आंखें लाल हो गईं। सब लोग लौट आए। रुकते भी कब तक!  फिर बहुत दिन बीत गए। शायद तीन महीने बाद की बात है। जाड़े के दिन थे। अचानक आधी रात को दरवाजे पर खड़खड़ाहट शुरू हुई। हां, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया था। मकान का दरवाजा बहुत बड़ा था और वह लकड़ी का नहीं था, टीन का था। इसलिए जरा सी भी आहट होती, तो बहुत शोर होता था। रात का सन्नाटा था। टीन के दरवाजे पर जो खड़खड़ाहट शुरू हुई, तो सब जाग उठे। समझ गए कि डाकू आ गए हैं।  सब डर गए, लेकिन यह क्या? खड़खड़ाहट हुए जा रही है, हुए जा रही है, रुकती ही नहीं। कभी कम, कभी तेज। डाकू तो ऐसा नहीं कर सकते। वे तो एकदम दरवाजा तोड़ देते हैं। कौन है यह? आदमी है, तो आवाज क्यों नहीं देता? तभी दादी एकदम चिल्ला पड़ीं, “मेरा मोती आया है।” सबने दादी की ओर देखा। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन भला मोती कहां से आता? वह दरवाजा कैसे खड़खड़ाएगा? लेकिन दादी ने तुरंत लालटेन उठाई और दरवाजा खोलने के लिए चल पड़ीं। उन्हें रोकना चाहा, लेकिन वह नहीं रुकीं। अब तो सबको ही पीछे-पीछे चलना पड़ा। भला, उन्हें अकेले कैसे जाने देते। अगर डाकू हुए तो! बस आगे-आगे हाथ में लालटेन लिए दादी थीं और पीछे थे कोई पंद्रह-बीस औरतें और आदमी हाथों में लाठियां लिए हुए। एक-दो के पास छुरे भी थे। पर डर सब रहे थे। जैसे-जैसे दरवाजे के पास आ रहे थे, एक और आवाज उनके कानों में पड़ रही थी। वह मोती की आवाज थी। हां, हां, यह मोती ही है। तभी किसी ने तेजी से आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया। सचमुच वह मोती था। दरवाजा खुलते ही वह तीर की तरह लपका और दादी से आ चिपटा। वह पागलों की तरह कभी इस कंधे पर झपटता, कभी उस कंधे पर चढ़ता, कभी मुंह चूमता और कभी अपना सिर उनकी गोद में रख देता। और दादी थीं कि रोए जा रही थीं। बोल रही थीं, “मेरा मोती, मेरा बेटा मोती, तू कहां गया था रे? मैं तुझे रोज याद करती थी और जानती थी कि तू एक दिन आएगा।” मोती केवल दादी से ही नहीं मिला, वह घर के हर सदस्य के पास गया। उनके पास भी गया, जो अभी तक सोए पड़े थे। सबके साथ उसने वैसा ही प्यार दिखाया। वह रात कब बीती, कब सवेरा हुआ, किसी को पता नहीं चला। लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि अगले दिन दादी ने देवी के मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के बाद सबको दो-दो पेड़े दिए थे। पूरे एक हफ्ते तक मोती की जो आवभगत हुई थी, उसकी चर्चा तो बच्चे बड़े हो जाने पर भी किया करते थे। लेकिन यही मोती एक दिन पागल हो गया। गांव में डाकू आते थे, तो गीदड़ भी आते थे। मोती अकसर उन गीदड़ों को मार भगाता था। कभी-कभी गीदड़ भी उसे काट लेते थे। एक दिन उन गीदड़ों में शायद कोई पागल गीदड़ भी आ गया था। उसी ने मोती को काट लिया और मोती पागल हो गया। उसके मुंह से बराबर राल टपकने लगी। उसकी आंखों का रंग बदलने लगा, लेकिन उसका प्यार अब भी कम नहीं हुआ था। अब लोग उससे डरते थे। दादी भी डरती थीं, रोती थीं। जिसे वह इतना प्यार करती थीं, उसे अब गोद में नहीं ले सकती थीं। मोती ने अभी तक किसी को काटा नहीं था, लेकिन काट तो सकता था। पागल कुत्ते चुपचाप काट लेते हैं। भौंकते तक नहीं। मोती ने किसी को काट लिया तो! पागल कुत्तों के काटने का उन दिनों कोई इलाज भी नहीं था। इसीलिए लोगों ने कहा, “मोती को मार डालो।” कैसी बुरी सलाह थी। दादी रोने लगीं। सब लोगों के दिल भर आए, लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं था। मोती को मारना ही होगा। फिर भी दो-तीन दिन बीत गए। इसी बीच में क्या हुआ कि घर का एक छोटा बच्चा अकेला सड़क पर निकल आया। वह धीरे-धीरे बाजार की ओर चल पड़ा। शाम का वक्त था। बैलगाड़ियां आ-जा रही थीं। अचानक एक गाड़ी के बैल भड़क उठे। वे तेजी से दौड़ने लगे। उनके ठीक सामने ही वह बच्चा चल रहा था। लोगों की निगाह उस पर पड़ी। वे चिल्लाए, “बच्चे को बचाओ, बच्चे को बचाओ।” दौड़ते बैलों को रोकना आसान काम नहीं था। एकाएक कोई आदमी सामने नहीं आया। लेकिन मोती यह सब देख रहा था। वह तेजी से झपटा। पहले जब कभी ऐसा होता था, तो मुंह से कपड़ा पकड़कर खींच लेता था और बच्चे को सड़क से दूर ले जाता था, लेकिन अब तो वह पागल था। देखने वाले डर गए। कहीं उसके दांत बच्चे के बदन में गए तो। लेकिन हुआ क्या? मोती तेजी से झपटा और उसने अपनी पीठ से धक्का देकर, बच्चे  को सड़क से बाहर धकेल दिया। उसे मुंह से नहीं पकड़ा।  लोगों ने यह सब देखा, तो अचरज से दांतों तले उंगली दबा ली। सब कहने लगे, “इतना समझदार कुत्ता! बीमार है, फिर भी बच्चे को बचा लिया।” 

 
 
 

Once upon a time, a daughter complained to her father that her life was miserable and that she didn’t know how she was going to make it. She was tired of fighting and struggling all the time. It seemed just as one problem was solved, another one soon followed. Her father, a chef, took her to the kitchen. He filled three pots with water and placed each on a high fire.

Once the three pots began to boil, he placed potatoes in one pot, eggs in the second pot and ground coffee beans in the third pot. He then let them sit and boil, without saying a word to his daughter. The daughter moaned and impatiently waited, wondering what he was doing. After twenty minutes he turned off the burners. He took the potatoes out of the pot and placed them in a bowl. He pulled the eggs out and placed them in a bowl. He then ladled the coffee out and placed it in a cup.

Turning to her, he asked. “Daughter, what do you see?” “Potatoes, eggs and coffee,” she hastily replied.

“Look closer”, he said, “and touch the potatoes.” She did and noted that they were soft.

He then asked her to take an egg and break it. After pulling off the shell, she observed the hard-boiled egg.

Finally, he asked her to sip the coffee. Its rich aroma brought a smile to her face.

“Father, what does this mean?” she asked.

He then explained that the potatoes, the eggs and coffee beans had each faced the same adversity-the boiling water. However, each one reacted differently. The potato went in strong, hard and unrelenting, but in boiling water, it became soft and weak. The egg was fragile, with the thin outer shell protecting its liquid interior until it was put in the boiling water. Then the inside of the egg became hard. However, the ground coffee beans were unique. After they were exposed to the boiling water, they changed the water and created something new.

Which one are you?” he asked his daughter. “When adversity knocks on your door, how do you respond? Are you a potato, an egg, or a coffee bean?”

Moral: In life, things happen around us, things happen to us, but the only thing that truly matters is how you choose to react to it and what you make out of it. Life is all about leaning, adopting and converting all the struggles that we experience into something positive.
 
 
 
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