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आज सोनू और मोनू बहुत खुश थे। आखिर पहले से बड़े घर में जो शिफ्ट हो गए थे। सोनू चहककर बोली, “मोनू देख, इस नए घर में कितनी बड़ी छत है!”

“हां, वहां तो छोटी सी छत थी। कहीं खेल भी नहीं पाते थे। अब तो खूब मस्ती करेंगे।” मोनू खुशी से बोला।

“लो भई, अभी आए हुए कुछ वक्त ही हुआ है और प्लानिंग शुरू।” पापा ने हंसते हुए कहा।

“चलो, पहले अपना-अपना सामान अपने कमरे में तो पहुंचाओ!” मम्मी ने मुसकराकर कहा।

“ठीक है मम्मी।” दोनों ने चहकते हुए जवाब दिया।

सारा परिवार घर की सेटिंग में लग गया। थोड़ी देर बाद मोनू ने पेट पकड़ते हुए कहा, “बहुत भूख लगी है दादी। आज खाने में क्या है?”

“अरे बुद्धू, दादी ने जो भी बनाया होगा, टेस्टी ही होगा और तेरी पसंद की कोई ना कोई डिश तो जरूर होगी।” सोनू ने कहा।

दादी हंसते हुए बोलीं, “हां-हां आओ, खाना खा लो। देखो, तुम्हारी पसंद की खीर भी है।”

खीर का नाम सुनते ही, सोनू-मोनू ही नहीं, पूरा परिवार डिनर के लिए दौड़ा। सब थक गए थे। इसलिए उस दिन जल्दी ही सो गए। सुबह सबकी आंख खुली, तो वह भी दादी मां के शोर से।

“हे राम! यह क्या हो रहा है, इस नए घर में? पूरे का पूरा दूध गायब है।” दादी चिल्लाईं।

“यह कैसे हो सकता है? आपको कुछ गलती लग रही होगी। दूध पहले ही खत्म हो चुका होगा, खीर जो बनी थी।” पापा ने समझाते हुए दादी से कहा।

पर नहीं, दादी को तो पूरा विश्वास था कि दूध उन्होंने उबालकर गैस पर ही रख दिया था। सारा दिन इसी सोच में चला गया कि आखिर दूध गया तो गया कहां?

सोने से पहले दादी ने उस दिन भी किचन में ही दूध उबालकर छोड़ा। अगले दिन फिर सुबह-सुबह दोनों बच्चों की आंख घर में मचे कोहराम से खुली। दादी चिल्ला रही थीं, “मैं कहती हूं, इस घर में भूत है! बाहर का दरवाजा बंद है। घर में कोई और आया नहीं। तुम ही बताओ कि दूध कहां चला गया?”

“भूत?” बच्चे चौंके।

“दादी मां, हमारी टीचर तो कहती हैं, भूत-वूत कुछ नहीं होता।” सोनू ने बड़ी ही मासूमियत से जवाब दिया।

“चुप रहो तुम दोनों! बड़ों के बीच में नहीं बोलते। बड़े आए मुझे समझाने वाले। जब मैं कह रही हूं भूत है, तो है।”

“अच्छा चलो, आपकी बात मान भी लेते हैं। पर भूत क्या सिर्फ दूध ही पीने आता है?” पापा के इतना कहते ही दोनों बच्चे हंसने लगे। उनको हंसते देख, दादी मां और गुस्सा हो गईं, “मैं यहां बिल्कुल नहीं रहूंगी। तुम लोगों को रहना है तो रहो, इस भूतिया महल में।”

मामला गंभीर था या नहीं, पर माहौल जरूर गंभीर हो गया था। बेचारे बच्चे चुपचाप अपने कमरे में चले गए। थोड़ी देर में सोनू बोली, “मैं जो सोच रही हूं, मोनू क्या तू भी वही सोच रहा है?”

“हां! यही न कि भूत को कैसे पकड़ें? मैं भी भूत पकड़ने की सोच रहा हूं।” मोनू ने जवाब दिया।

इसके बाद दोनों हंस पड़े। दोनों ने हाथ से हाथ मिलाया।

रात को सबके सोते ही, सोनू ने मोनू को उठाया और दोनों किचन के बाहर बैठ गए।

“सुन सोनू, मुझे बहुत डर लग रहा है।”

“डर तो मुझे भी लग रहा है, पर क्या करें?” सोनू बोली।

“मैं हूं ना! डरो मत”! पीछे से आवाज आई।

“कौन? कहते हुए बच्चों ने डरते हुए पीछे मुड़कर देखा, तो उनके पापा खड़े मुसकरा रहे थे। उन्होंने बच्चों को इशारे से चुप रहने को कहा और खुद भी वहीं बैठ गए।

आधी रात बीत गई। अब तो सोनू-मोनू को बहुत तेज नींद आने लगी थी।

“पापा चलें…कोई भूत-वूत नहीं होता। प्लीज, आप दादी को समझाओ ना!” मोनू बोला।

“मुझे यह घर बहुत पसंद है। मैं यहां से नहीं जाना चाहती।” सोनू ने भी कहा।

तभी उन्हें किसी की आहट सुनाई दी। यह आवाज रसोईघर से आ रही थी। अब तो बच्चे सच में डर गए।

“डरो मत! टॉर्च जलाओ! यदि लाइट जलाई, तो भूत अलर्ट हो जाएगा!” पापा ने फुसफुसाकर कहा।

सोनू ने फौरन टॉर्च जलाई।

“अरे, क्या यह भूत है?” तीनों जोर से हंसने लगे।

“भूत पकड़ा गया, आओ भूत पकड़ा गया।” तीनों ने शोर मचाया।

दरअसल यह भूत कोई और नहीं, पड़ोस वाले अंकल की पालतू बिल्ली थी। वह घर के किचन में सर्विस विंडो के रास्ते प्रवेश करती थी और मौका देखकर पूरा दूध चट कर जाती थी।

“लेकिन बेटा! यह आई कहां से? तुम तो दरवाजा बंद कर देते थे ना?” दादी मां ने देखा, तो आश्चर्य से पूछा।

“अरे, मेरी प्यारी दादी! भूल गईं आप, दरवाजे की जगह आयरन ग्रिल बंद की जाती है।” दोनों बच्चों ने अपने पापा से पहले ही जवाब दे दिया।

“अब तो मान जाओ न दादी, भूत-वूत कुछ नहीं होता।” बच्चों ने कहा, तो दादी के साथ सब मुसकरा पड़े।

दादी ने प्यार से दोनों बच्चों के सिर पर हाथ फेरा, “मेरे समझदार बच्चे।”

 
 
 

रीना जहां रहती थी, वहां हर कोई दुर्गा पूजा के उत्सव की तैयारी में लगा था। रीना के बड़े भैया का तो बोलबाला था। वह संगीत, नृत्य, गायन व खेलों में हमेशा अव्वल आते थे। वह कॉलेज जाने के बाद इन सबके अभ्यास में अपना वक्त बिताते थे। रीना उन्हें देख-देखकर हमेशा सोचती कि भैया की मोहल्ले में सब लोग जितनी तारीफ करते हैं, काश, मेरी भी उतनी ही तारीफ होती। वैसे रीना की तारीफ होती तो थी, लेकिन केवल पढ़ाई के लिए। वह पढ़ाई में तो खूब होशियार थी, लेकिन कुछ और भी ऐसा करना चाहती थी, जिससे लोग उसके बड़े भैया की तरह उसकी भी तारीफ करें। नन्ही रीना के दोस्तों में कोई फैंसी ड्रेस के लिए तैयारी कर रहा था, कोई सोलो डांस के लिए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वैसे करने को तो बहुत कुछ था, पर वह सबसे अलग कुछ करना चाहती थी।

 
 
 

रीना जहां रहती थी, वहां हर कोई दुर्गा पूजा के उत्सव की तैयारी में लगा था। रीना के बड़े भैया का तो बोलबाला था। वह संगीत, नृत्य, गायन व खेलों में हमेशा अव्वल आते थे। वह कॉलेज जाने के बाद इन सबके अभ्यास में अपना वक्त बिताते थे। रीना उन्हें देख-देखकर हमेशा सोचती कि भैया की मोहल्ले में सब लोग जितनी तारीफ करते हैं, काश, मेरी भी उतनी ही तारीफ होती। वैसे रीना की तारीफ होती तो थी, लेकिन केवल पढ़ाई के लिए। वह पढ़ाई में तो खूब होशियार थी, लेकिन कुछ और भी ऐसा करना चाहती थी, जिससे लोग उसके बड़े भैया की तरह उसकी भी तारीफ करें। नन्ही रीना के दोस्तों में कोई फैंसी ड्रेस के लिए तैयारी कर रहा था, कोई सोलो डांस के लिए। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? वैसे करने को तो बहुत कुछ था, पर वह सबसे अलग कुछ करना चाहती थी। 

एक दिन वह उसी सोच-विचार में डूबी थी कि रीना के रॉनी भैया ने उसे देखा। उन्होंने प्यार से आकर अपनी  नन्ही बहन से पूछा कि वह इतनी उदास क्यों बैठी है? नन्ही रीना तो इसी का इंतजार कर रही थी, क्योंकि भैया को परेशान करने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसके भैया इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। बस, जब भइया ने पूछा, तो रीना ने फटाफट अपनी इच्छा बता दी कि वह इस दुर्गा पूजा में कुछ ऐसा करना चाहती है, जो सबसे अलग हो और लोगों को खूब पसंद आए। रीना की बात सुनकर रॉनी भैया हंस पड़े और बोले, “हम्म… कुछ अलग सोचना तो वाकई कठिन है। थोड़ा सोचकर बताता हूं।”

अगले दिन जब रीना स्कूल से वापस घर पहुंची, तब रॉनी भैया उसे उसके कमरे में ले गए। वहां एक बड़ा सा डिब्बा रखा हुआ था। उन्होंने रीना से आंखें बंद करने को कहा और जब रीना ने आंखें खोलीं, तो सामने एक कैसियो मिनी की-बोर्ड रखा था। रीना खुशी से चिल्ला उठी, “भैया, यह तो की-बोर्ड है।” 

“हां, और इस पर मैं तुम्हें कुछ ही दिन में कई धुनें निकालना सिखा दूंगा। उसके बाद तुम और दादाजी मिलकर इस पर अच्छे-अच्छे गाने का अभ्यास कर लेना और दादा-पोती की जोड़ी की परफॉर्मेंस देना। देखना सबको कितना मजा आएगा। दादाजी भी तैयार हैं इसके लिए।”

रीना ने भैया और दादाजी के साथ अपने पसंदीदा गाने की की-बोर्ड पर प्रैक्टिस करनी शुरू कर दी। फिर क्या था! अभी तक तो दादाजी ही साथ थे, फिर उसके बैंड में दादी और दादाजी के कुछ दोस्त भी शामिल हो गए। दुर्गा पूजा उत्सव के मेले में रीना की अगुवाई में की-बोर्ड के साथ दादा-दादी बैंड की परफॉर्मेंस पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय थी। अब मोहल्ले में रीना भी अपने एक अच्छे काम से रॉनी भैया की तरह प्रसिद्ध हो गई थी।’ 

 
 
 
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